राजस्थान: की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। अजमेर में होने जा रही प्रधानमंत्री की रैली से पहले विरोध की राजनीति तेज हो गई है। नरेंद्र मोदी के 28 फरवरी के दौरे को लेकर करणी सेना और सवर्ण समाज ने खुला विरोध करने का ऐलान किया है। संगठन ने रैली के दौरान काले झंडे दिखाने और ‘यूजीसी रोलबैक’ के नारे लगाने की चेतावनी दी है।
यह घोषणा करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना ने जयपुर में आयोजित प्रेस वार्ता में की। उनके बयान के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 फरवरी को अजमेर में एक बड़े कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले हैं। इस दौरान वे करीब 23,500 करोड़ रुपये के विकास कार्यों का शिलान्यास और लोकार्पण करेंगे। साथ ही रोजगार उत्सव के तहत लगभग 21 हजार युवाओं को नियुक्ति पत्र भी वितरित किए जाएंगे।
लेकिन इस कार्यक्रम से पहले करणी सेना और सवर्ण समाज ने यूजीसी कानून को लेकर नाराजगी जताई है। उनका आरोप है कि इस कानून में ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जिनसे सवर्ण समाज के हित प्रभावित हो रहे हैं।
जयपुर में प्रेस वार्ता के दौरान महिपाल सिंह मकराना ने कहा कि यूजीसी कानून को लेकर देशभर में असंतोष है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने बिना व्यापक चर्चा के यह कानून लागू किया है, जिससे समाज में भ्रम और नाराजगी है।
मकराना ने कहा—
“यदि सरकार ने समय रहते यूजीसी कानून को वापस नहीं लिया, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। अजमेर में प्रधानमंत्री की रैली के दौरान सवर्ण समाज के युवा काले झंडे दिखाकर विरोध दर्ज कराएंगे।”
उनका यह बयान राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है।
करणी सेना ने 8 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘यूजीसी रोलबैक’ को लेकर महाआंदोलन की घोषणा की है। आयोजकों का दावा है कि इस आंदोलन को देशभर के सैकड़ों संगठनों का समर्थन मिल रहा है।
प्रेस वार्ता में स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार को 19 मार्च तक जवाब देने का समय दिया है। उनका कहना है कि कानून में कई कमियां हैं और सरकार को इसे पुनर्विचार के लिए वापस लेना चाहिए।
आंदोलन को लेकर आयोजकों ने दावा किया है कि राजस्थान से करीब 500 बसों के जरिए हजारों लोग दिल्ली पहुंचेंगे। इसके अलावा ट्रेन और निजी वाहनों से भी बड़ी संख्या में लोग आंदोलन में शामिल होंगे।
करणी सेना का कहना है कि दिल्ली में होने वाला यह महाआंदोलन निर्णायक साबित होगा और सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ेगी।
प्रधानमंत्री का अजमेर दौरा विकास कार्यों और रोजगार वितरण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन विरोध के ऐलान ने राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विरोध प्रदर्शन आगामी चुनावी माहौल को भी प्रभावित कर सकता है। खासकर तब, जब सवर्ण समाज के मुद्दे पर खुलकर आंदोलन की घोषणा की गई है।
सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री के दौरे को लेकर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है। खुफिया एजेंसियां भी सक्रिय हो गई हैं। विरोध प्रदर्शन की चेतावनी को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जा सकता है।
अजमेर जिला प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने की बात कही है।
हालांकि सरकार की ओर से अभी तक आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि यूजीसी कानून में कुछ प्रावधान ऐसे हैं, जिनसे शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संतुलन प्रभावित होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा से जुड़े किसी भी कानून पर व्यापक संवाद और पारदर्शिता जरूरी होती है। यदि किसी वर्ग को असंतोष है, तो सरकार को संवाद के जरिए समाधान निकालना चाहिए।
28 फरवरी को होने वाली रैली में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना है। यदि विरोध प्रदर्शन होता है, तो प्रशासन के लिए भी यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होगी।
करणी सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका विरोध शांतिपूर्ण होगा, लेकिन काले झंडे दिखाकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई जाएगी।
यह विरोध केवल एक संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि सवर्ण समाज के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक बहस शुरू हो सकती है।
राजनीतिक दलों की नजर भी इस घटनाक्रम पर टिकी है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।
अजमेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से पहले करणी सेना द्वारा विरोध का ऐलान राज्य की राजनीति में नई हलचल लेकर आया है। यूजीसी कानून को लेकर सवर्ण समाज की नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। 8 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित महाआंदोलन इस विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर ले जा सकता है।
अब सबकी नजर 28 फरवरी पर टिकी है—क्या विरोध शांतिपूर्ण रहेगा या राजनीतिक टकराव की स्थिति बनेगी? यह आने वाला समय ही बताएगा।
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