प्रयागराज: “सतुआ बाबा से जुड़ जाएं, जो नहीं जुड़ेगा… आख़िरी वक्त में उनके पास ही जाएगा।”
यह बयान 10 जनवरी को प्रयागराज के मंच से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिया और इसके बाद यूपी की राजनीति में एक नाम अचानक चर्चा के केंद्र में आ गया—सतुआ बाबा।
माघ मेले में 3 करोड़ रुपये की लैंड रोवर डिफेंडर से पहुंचने वाले, महंगे रे-बैन सनग्लास पहनने वाले और अक्सर हेलिकॉप्टर व हवाई जहाज के साथ नजर आने वाले सतुआ बाबा अब केवल एक संत नहीं, बल्कि सियासी संकेत के तौर पर भी देखे जा रहे हैं।
बहुत कम लोग जानते हैं कि सतुआ बाबा उनका असली नाम नहीं है। उनका वास्तविक नाम संतोष तिवारी उर्फ संतोष दास है। वह उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के रहने वाले हैं।
सतुआ बाबा वाराणसी के विष्णु स्वामी संप्रदाय से जुड़े हैं। इस संप्रदाय में पीठाधीश्वर को ही ‘सतुआ बाबा’ कहा जाता है। वर्ष 2012 में छठे पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन यमुनाचार्य जी महाराज के निधन के बाद संतोष दास को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके साथ ही वह विष्णु स्वामी संप्रदाय के 57वें आचार्य बने।
संतोष दास ने मात्र 11 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर अध्यात्म का मार्ग अपना लिया था। उन्हें काशी विश्वनाथ परंपरा का प्रतिनिधि भी माना जाता है।
महाकुंभ 2025 के दौरान उन्हें जगतगुरु की उपाधि दी गई। इस समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं मौजूद रहे थे। कुंभ और माघ मेले के दौरान योगी के साथ उनकी मौजूदगी कई बार कैमरों में कैद हो चुकी है।
प्रयागराज माघ मेले में सतुआ बाबा को प्रशासन द्वारा सबसे अधिक जमीन आवंटित की गई है। हालांकि इस जमीन का कुल क्षेत्रफल सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन उनका आश्रम मेला क्षेत्र का सबसे बड़ा बताया जा रहा है।
आश्रम के बाहर खड़ी 3 करोड़ रुपये की लैंड रोवर डिफेंडर मेले में मौजूद अन्य साधु-संतों की गाड़ियों से बिल्कुल अलग नजर आती है। कार पर साफ लिखा है—
“विष्णु स्वामी संप्रदाय, जगदगुरु सतुआ बाबा।”
आश्रम के भीतर सतुआ बाबा बेहद सादे वस्त्रों में नजर आते हैं, लेकिन आंखों पर अक्सर महंगे रे-बैन सनग्लास होते हैं। यह सादगी और आधुनिकता का मेल उन्हें अन्य संतों से अलग पहचान देता है।
सतुआ बाबा को लेकर राजनीति तब तेज हुई, जब 24 दिसंबर को प्रयागराज के डीएम मनीष कुमार वर्मा उनके आश्रम पहुंचे और कोट पहने हुए चूल्हे पर रोटियां सेंकीं। बाबा बगल में बैठकर उन्हें तरीका बताते दिखे।
छह दिन बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने माघ मेला निरीक्षण के दौरान इस पर तंज कसते हुए कहा—
“जाम देखिए, सतुआ बाबा की रोटी के चक्कर में मत पड़िए, फील्ड में काम करिए।”
इस बयान को योगी आदित्यनाथ और केशव मौर्य के बीच लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक खींचतान से जोड़कर देखा गया।
2017 में भाजपा की बड़ी जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर चली खींचतान, 2022 में केशव मौर्य की विधानसभा हार, विभागों को लेकर विवाद, और 2024 लोकसभा चुनाव के बाद दिए गए बयानों ने दोनों नेताओं के बीच दूरी को सार्वजनिक कर दिया था।
ऐसे में सतुआ बाबा से जुड़े घटनाक्रम को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
10 जनवरी को प्रयागराज में रामानंदाचार्य जयंती समारोह में योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सतुआ बाबा समाज को जोड़ने का काम कर रहे हैं। उन्होंने जाति और संप्रदाय के नाम पर विभाजन को खतरनाक बताते हुए कहा कि जो लोग नहीं जुड़ेंगे, उन्हें अंततः सतुआ बाबा की शरण में जाना ही पड़ेगा।
योगी ने यह भी कहा कि काशी के मणिकर्णिका घाट पर बैठने वाले सतुआ बाबा अंतिम समय में हर किसी के लिए मार्गदर्शक बनते हैं।
सतुआ बाबा अब केवल एक युवा संत या माघ मेले की आकर्षण का केंद्र नहीं रह गए हैं। उनका नाम योगी आदित्यनाथ के बयान, प्रशासनिक गतिविधियों और डिप्टी सीएम के तंज के चलते यूपी की राजनीति के बीचोंबीच आ गया है। अध्यात्म, सत्ता और संकेतों का यह संगम आने वाले समय में और क्या रूप लेगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
All Rights Reserved & Copyright © 2015 By HP NEWS. Powered by Ui Systems Pvt. Ltd.