राजस्थान: की शैक्षणिक और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा एक अहम मामला अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ वेटेनरी एंड एनिमल साइंसेज (राजुवास) के कुलगुरु (वाइस चांसलर) की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्यपाल को नोटिस जारी किया है।
यह नोटिस राज्यपाल एवं राजुवास के कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे को उनके सचिव के माध्यम से जारी किया गया है। मामले की सुनवाई राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत में 25 फरवरी को हुई। अदालत ने राज्यपाल से तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
याचिका डॉ. आर.के. बाघेरवाल की ओर से दायर की गई है। इसमें राज्यपाल द्वारा 4 सितंबर 2025 को डॉ. सुमंत व्यास को राजुवास का कुलगुरु नियुक्त किए जाने को चुनौती दी गई है।
याचिका में कहा गया है कि नियुक्ति यूजीसी (UGC) के नियमों के विपरीत की गई है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए।
डॉ. सुमंत व्यास वर्तमान में राजुवास के वीसी पद पर कार्यरत हैं। वे इससे पहले राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (NRCC) में वैज्ञानिक के रूप में कार्य कर चुके हैं और जोधपुर स्थित काजरी (CAZRI) के निदेशक भी रह चुके हैं।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दिनेश यादव ने अदालत को बताया कि वीसी नियुक्ति के लिए राज्यपाल के आदेश से सर्च कमेटी का गठन किया गया और 3 मई 2025 को विज्ञापन जारी हुआ।
मगर यूजीसी के नियमों के अनुसार सर्च कमेटी का चेयरमैन उस विश्वविद्यालय से संबद्ध नहीं होना चाहिए, जिसके लिए नियुक्ति हो रही है। आरोप है कि विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर त्रिभुवन शर्मा को कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया, जो पहले राजुवास के एनिमल न्यूट्रिशन विभाग के एचओडी रह चुके हैं।
याचिका में कहा गया है कि यह नियुक्ति नियमों के खिलाफ है और इससे चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
सबसे बड़ा विवाद वीसी के लिए अनिवार्य 10 साल के शिक्षण अनुभव को लेकर है। याचिकाकर्ता का दावा है कि डॉ. सुमंत व्यास के पास विश्वविद्यालय स्तर पर 10 वर्ष का नियमित टीचिंग अनुभव नहीं है, जो कि यूजीसी के दिशा-निर्देशों के तहत अनिवार्य है।
यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो नियुक्ति को अवैध ठहराया जा सकता है। अदालत ने इसी आधार पर राज्यपाल, विश्वविद्यालय के कुलगुरु, रजिस्ट्रार और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।
राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (चांसलर) होते हैं और कुलगुरु की नियुक्ति उनके अधिकार क्षेत्र में आती है। ऐसे में इस मामले ने संवैधानिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक प्रक्रिया दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में इस मामले को गंभीरता से देखा जा रहा है, क्योंकि यह विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों की पारदर्शिता और वैधानिकता से जुड़ा मुद्दा है।
यूजीसी के नियमों के अनुसार किसी भी विश्वविद्यालय के कुलगुरु पद के लिए उम्मीदवार के पास:
कम से कम 10 वर्षों का प्रोफेसर स्तर का अनुभव
प्रशासनिक अनुभव
उत्कृष्ट अकादमिक रिकॉर्ड
होना आवश्यक है।
याचिका में दावा किया गया है कि इन शर्तों का पालन नहीं हुआ।
राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ वेटेनरी एंड एनिमल साइंसेज (राजुवास) राज्य का प्रमुख पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय है। यहां कुलगुरु की नियुक्ति शैक्षणिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन ने फिलहाल कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया है। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय कोर्ट में अपना पक्ष रखेगा।
यदि अदालत नियुक्ति को अवैध ठहराती है, तो न केवल वर्तमान वीसी की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है, बल्कि भविष्य में होने वाली नियुक्तियों की प्रक्रिया पर भी सख्त निगरानी बढ़ सकती है।
यह मामला राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी मिसाल बन सकता है, जहां नियुक्तियों को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं।
हाईकोर्ट ने राज्यपाल सहित सभी पक्षकारों को तीन सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद अगली सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि नियुक्ति पर रोक लगाई जाए या नहीं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मामला तकनीकी और नियम आधारित है। यदि नियमों का उल्लंघन साबित हुआ, तो अदालत सख्त रुख अपना सकती है।
राजुवास के कुलगुरु की नियुक्ति को लेकर उठे सवाल अब न्यायिक कसौटी पर हैं। राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा राज्यपाल को नोटिस जारी करना इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
अब सबकी नजर अदालत में दाखिल होने वाले जवाब और आगामी सुनवाई पर है। यह मामला न केवल एक विश्वविद्यालय की नियुक्ति का है, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों में पारदर्शिता और नियमों के पालन की व्यापक बहस को भी जन्म दे सकता है।
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