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मोदी की इज़राइल कूटनीति का गुप्त संदेश? 1962 से 2023 तक की वो रणनीति जिसने बदला आतंकवाद का खेल

इतिहास: केवल घटनाओं का संग्रह नहीं होता; वह भविष्य की दिशा तय करने वाला दर्पण भी होता है। भारत और इज़राइल के संबंध इसी ऐतिहासिक गहराई और रणनीतिक परिपक्वता के प्रतीक हैं। जब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इज़राइल की यात्रा की, तो यह केवल एक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि वैश्विक राजनीति के मंच पर भारत के स्पष्ट और दृढ़ संदेश का उद्घोष था—भारत आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी अस्पष्टता के खड़ा है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: शरण, सम्मान और सह-अस्तित्व

भारत की सभ्यता ने सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सिद्धांत को आत्मसात किया है। जब यहूदी समुदाय को अपने पैतृक भूभाग से विस्थापन, धार्मिक उत्पीड़न और विनाश का सामना करना पड़ा—विशेषकर 70 ईस्वी में यरुशलम के दूसरे मंदिर के ध्वंस के बाद—तब भारत ने उन्हें सुरक्षित आश्रय दिया। यह इतिहास का दुर्लभ उदाहरण है जहाँ किसी बाहरी समुदाय को बिना भेदभाव के सम्मान और स्वतंत्रता मिली।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए होलोकॉस्ट में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक रही। इसी पृष्ठभूमि में 14 मई 1948 को Israel ने स्वतंत्रता की घोषणा की। तत्काल पड़ोसी अरब देशों ने उस पर आक्रमण किया और दशकों तक संघर्ष जारी रहा।

भारत ने 17 सितंबर 1950 को इज़राइल को मान्यता दी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध 29 जनवरी 1992 को स्थापित हुए। यह विलंब तत्कालीन भू-राजनीतिक संतुलनों और घरेलू समीकरणों का परिणाम था।

संकट में परखी गई मित्रता

औपचारिक संबंधों से पहले भी भारत और इज़राइल के बीच मौन सहयोग मौजूद था।

  • 1962 के भारत–चीन युद्ध में, जब भारत सैन्य तैयारी में कमजोर था, इज़राइल ने गुप्त रूप से सैन्य सहायता प्रदान की।

  • 1965 के भारत–पाक युद्ध में अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच इज़राइल ने गोला-बारूद उपलब्ध कराया।

  • 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भी सहयोग जारी रहा।

  • 1999 के कारगिल युद्ध में लेज़र-गाइडेड बम और सर्चर ड्रोन की आपूर्ति निर्णायक सिद्ध हुई।

यह सहयोग केवल रक्षा लेन-देन नहीं था; यह भरोसे की नींव थी।

2017: संबंधों का सार्वजनिक पुनर्परिभाषण

जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री मोदी की ऐतिहासिक यात्रा ने भारत-इज़राइल संबंधों को खुला और रणनीतिक आयाम दिया। यह पहली बार था जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इज़राइल की आधिकारिक यात्रा की। इस कदम ने दशकों की “हाइफ़नेटेड डिप्लोमेसी” (Israel-Palestine को एक साथ देखने की नीति) से आगे बढ़कर स्वतंत्र द्विपक्षीय संबंधों का संकेत दिया।

यह संदेश स्पष्ट था—भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध तय करेगा।

7 अक्टूबर 2023 के बाद का वैश्विक परिदृश्य

7 अक्टूबर 2023 को हुए हमले के बाद पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर पहुंच गया। भारत उन शुरुआती देशों में था जिसने स्पष्ट शब्दों में हमले की निंदा की और आतंकवाद के खिलाफ अपना रुख दोहराया।

भारत की नीति—“Zero Tolerance for Terrorism”—अब केवल बयान नहीं, बल्कि सक्रिय कूटनीतिक सिद्धांत बन चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह संदेश केवल हमले की प्रतिक्रिया नहीं था; यह उन राष्ट्रों और संगठनों के लिए भी संकेत था जो आतंक को परोक्ष या प्रत्यक्ष समर्थन देते हैं।

रणनीतिक संतुलन: इज़राइल और ईरान के बीच

भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख स्तंभ रणनीतिक स्वायत्तता है। एक ओर इज़राइल रक्षा, साइबर और कृषि तकनीक में विश्वसनीय साझेदार है; दूसरी ओर ईरान ऊर्जा और संपर्क परियोजनाओं के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है।

हाल के वर्षों में क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव के संकेत दिखे हैं। भारत अपनी प्राथमिकताओं का पुनर्संतुलन कर रहा है—जहाँ सुरक्षा और तकनीकी सहयोग को अधिक महत्व मिल रहा है।

भविष्य का युद्ध: मिसाइल, ड्रोन और लेज़र

आधुनिक युद्ध पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ चुका है। ड्रोन स्वार्म, बैलिस्टिक मिसाइल और साइबर हमले भविष्य के संघर्षों का चेहरा हैं। भारत बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली विकसित कर रहा है, जो ‘सुदर्शन चक्र’ की तरह सर्वदिशात्मक सुरक्षा दे सके।

इज़राइल की ‘आयरन डोम’ और ‘आयरन बीम’ जैसी प्रणालियाँ विश्व में प्रभावी सिद्ध हुई हैं। भारत और इज़राइल के बीच रक्षा तकनीक के सह-विकास की दिशा में “I2T2”—India’s Talent, Israel’s Technology—एक नई अवधारणा के रूप में उभरी है।

यह मॉडल केवल आयात नहीं, बल्कि सह-उत्पादन और आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम है।

आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक संदेश

यह यात्रा किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है। भारत खाड़ी देशों के साथ मजबूत आर्थिक और सामरिक संबंध रखता है। संदेश उन राज्यों और संगठनों के लिए है जो आतंकवाद को नीति का साधन बनाते हैं।

भारत का स्पष्ट रुख है—आतंकवाद को बढ़ावा देने वालों के लिए वैश्विक मंच पर स्थान सीमित होता जाएगा।

बदलती वैश्विक धुरी में भारत की भूमिका

विश्व राजनीति बहुध्रुवीय होती जा रही है। अमेरिका, रूस, चीन और यूरोप के बीच शक्ति-संतुलन में भारत एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है। पश्चिम एशिया में स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इज़राइल के साथ मजबूत संबंध भारत को तकनीकी बढ़त, रक्षा आधुनिकीकरण और खुफिया सहयोग प्रदान करते हैं।

कूटनीति से परे—विश्वास का आयाम

भारत–इज़राइल संबंध केवल समझौतों तक सीमित नहीं हैं। यह संबंध संकट में परखे गए भरोसे पर आधारित हैं। जब वैश्विक शक्तियाँ दूरी बना रही थीं, तब इज़राइल ने सहयोग दिया।

आज वही मित्रता खुले और दृढ़ रणनीतिक साझेदारी में बदल चुकी है।


निष्कर्ष:

प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की नई रणनीतिक सोच का प्रतीक है। यह स्पष्ट संदेश है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठजोड़ का सक्रिय हिस्सा है और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी स्तर पर निर्णय लेने को तैयार है।

इतिहास से मिली सीख, वर्तमान की रणनीति और भविष्य की तैयारी—इन तीनों का संगम इस यात्रा में दिखाई देता है। भारत मित्रता निभाना जानता है, और आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक रुख अपनाना भी।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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