फाल्गुन पूर्णिमा: के पावन अवसर पर 2 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा। इस दिन सूर्यास्त के बाद से होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शुरू होगा, जो आधी रात तक रहेगा। पंचांग के अनुसार शाम करीब 6 बजे से रात 12 बजे तक होली जलाने का उत्तम समय है। विशेष बात यह है कि इस अवधि में भद्रा काल नहीं रहेगा, इसलिए इसे अत्यंत शुभ माना जा रहा है।
परंपरा के अनुसार, पहले होली की विधिवत पूजा की जाती है और उसके बाद अग्नि प्रज्वलित की जाती है। यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं से जुड़ा गहरा प्रतीक है।
प्राचीन काल में होली को वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता था। फाल्गुन पूर्णिमा के आसपास ठंड विदा होती है और प्रकृति में नए रंगों की बहार आती है। 7वीं सदी में सम्राट हर्ष के नाटक Ratnavali में वसंत उत्सव का उल्लेख मिलता है, जहां दरबार में संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते थे।
समय के साथ यह उत्सव लोकजीवन में उतर आया और अबीर-गुलाल और रंगों की होली के रूप में विकसित हुआ।
पूर्वी भारत और वैष्णव परंपराओं में होली का विशेष स्वरूप दोलयात्रा या दोल पूर्णिमा है। इस दिन राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को सुसज्जित झूले या पालकी में विराजित कर शोभायात्रा निकाली जाती है।
यह परंपरा बंगाल और ओडिशा में विशेष रूप से प्रचलित है। इस दिन को Chaitanya Mahaprabhu की जयंती से भी जोड़ा जाता है। भक्ति, कीर्तन और अबीर-गुलाल के साथ यह उत्सव मनाया जाता है।
ब्रज क्षेत्र में होली का सबसे प्रसिद्ध स्वरूप राधा-कृष्ण की फाग-लीला है। वैष्णव ग्रंथ Garga Samhita में होलिकोत्सव का उल्लेख मिलता है, जिसमें राधा और सखियों के साथ श्रीकृष्ण की रंग-लीला का वर्णन है।
मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव की होली केवल रंग खेलने का पर्व नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम का उत्सव है। यहां लठमार होली, फूलों की होली और फाग-गायन की परंपरा आज भी जीवंत है।
होली को कृषि से भी जोड़ा जाता है। रबी की फसल पकने लगती है और किसान नई उपज के स्वागत में उत्सव मनाते हैं। होलिका दहन में गेहूं की बालियां अर्पित की जाती हैं। यह समृद्धि और उन्नति का प्रतीक माना जाता है।
समाजशास्त्रियों के अनुसार, होली सामाजिक दूरी और मनमुटाव कम करने का पर्व है। “बुरा न मानो होली है” केवल कहावत नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप की परंपरा है। लोग पुराने विवाद भुलाकर गले मिलते हैं और नई शुरुआत करते हैं।
स्थान चयन: साफ जगह पर लकड़ी, उपले और सूखी टहनियों से होलिका सजाएं।
पूजा सामग्री: रोली, चावल, फूल, माला, कच्चा सूत, नारियल, गेहूं की बालियां रखें।
पूजन: होलिका के चारों ओर जल से छिड़काव करें। रोली-चावल अर्पित करें।
परिक्रमा: कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर लपेटें और कम से कम तीन परिक्रमा करें।
प्रार्थना: परिवार की सुख-समृद्धि और नकारात्मकता के नाश की कामना करें।
अग्नि प्रज्वलन: सूर्यास्त के बाद शुभ मुहूर्त में अग्नि जलाएं।
मान्यता है कि Krishna ने युधिष्ठिर को ढोंढा नामक राक्षसी की कथा सुनाई थी। यह राक्षसी बच्चों को परेशान करती थी। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन लोगों ने शोर-शराबा और हंसी-मजाक के जरिए उसे भगाया। तभी से इस दिन उल्लासपूर्वक होली मनाने की परंपरा शुरू हुई।
सबसे प्रसिद्ध कथा हिरण्यकश्यप, उसके पुत्र प्रह्लाद और बहन होलिका से जुड़ी है। हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर मानता था, लेकिन प्रह्लाद भगवान विष्णु के भक्त थे।
होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान था। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, लेकिन वरदान का दुरुपयोग करने के कारण होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गए।
यह कथा सत्य की असत्य पर विजय का प्रतीक है।
फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। मान्यता है कि कामदेव ने शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया। क्रोधित होकर शिव ने तीसरी आंख खोल दी और कामदेव भस्म हो गए।
बाद में रति के अनुरोध पर शिव ने कामदेव को अनंग रूप में पुनर्जीवित किया। इसी तिथि पर होलिका दहन की परंपरा भी जुड़ी मानी जाती है।
आज होली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। गांव से लेकर महानगरों तक लोग रंगों, संगीत और मिठाइयों के साथ इसे मनाते हैं।
हालांकि, पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षित होली मनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। प्राकृतिक रंगों का उपयोग और जल संरक्षण की अपील की जाती है।
2 मार्च को होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजे से शुरू होकर आधी रात तक रहेगा। यह पर्व केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि वसंतोत्सव, भक्ति, कृषि और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
चाहे वह प्रह्लाद की आस्था की कथा हो, राधा-कृष्ण की फाग-लीला या शिव-कामदेव की पौराणिक घटना—होली हर रूप में सकारात्मकता, प्रेम और नए आरंभ का संदेश देती है।
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