उत्तर प्रदेश: के गाजियाबाद से सामने आया हरीश राणा का मामला पूरे देश को भावुक कर रहा है। 13 साल से कोमा में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे Harish Rana को आखिरकार इच्छामृत्यु की अनुमति मिल गई है। Supreme Court of India ने इस मामले में पैसिव यूथेनेशिया यानी जीवनरक्षक उपकरण हटाने की मंजूरी दी है।
कोर्ट के फैसले के बाद हरीश राणा को गाजियाबाद से All India Institute of Medical Sciences Delhi में शिफ्ट किया गया है, जहां डॉक्टरों की निगरानी में आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
एम्स ले जाने से पहले परिवार के सदस्यों ने उन्हें भावुक विदाई दी। उनकी बहन कुमारी लवली ने माथे पर चंदन का तिलक लगाते हुए कहा, “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ… ठीक है।” इस दृश्य को देखकर परिवार के सभी सदस्य भावुक हो गए और उनकी आंखें नम हो गईं।
परिवार ने हरीश को गाजियाबाद स्थित अपने किराए के फ्लैट से बेहद गोपनीय तरीके से एम्स दिल्ली पहुंचाया। इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी आसपास के लोगों और सोसायटी के सदस्यों तक को नहीं दी गई।
बताया गया कि Ghaziabad की Raj Empire Society में रहने वाला परिवार प्राइवेट गाड़ी से हरीश को दिल्ली ले गया।
करीबियों के मुताबिक परिवार ने जानबूझकर इस प्रक्रिया को निजी रखा ताकि अनावश्यक भीड़ और भावनात्मक माहौल से बचा जा सके।
हरीश के पिता Ashok Rana ने कहा कि यह फैसला उनके परिवार के लिए बेहद कठिन था। उन्होंने कहा कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के लिए ऐसा फैसला नहीं लेना चाहते, लेकिन मजबूरी में उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
उन्होंने बताया कि वह और उनकी पत्नी पिछले 13 साल से अपने बेटे की देखभाल कर रहे थे। इस दौरान परिवार ने इलाज के लिए अपनी संपत्ति तक बेच दी, लेकिन हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।
अशोक राणा ने अदालत, डॉक्टरों और वकीलों का धन्यवाद करते हुए कहा कि अब उनके बेटे को पीड़ा से मुक्ति मिल सकेगी।
हरीश की मां Nirmala Rana इस पूरे घटनाक्रम से बेहद भावुक हैं। उन्होंने बताया कि पिछले कई सालों से वह अपने बेटे की हर रोज मालिश करती थीं और उससे बातें करती थीं।
वह कहती हैं कि कई बार उन्हें लगता था कि शायद हरीश उनकी बातें सुन रहा है। जब कभी वह उबासी लेता या आंखों के आसपास हल्की हरकत होती, तो उन्हें लगता कि बेटा जिंदा है और उनकी आवाज सुन रहा है।
एक मां के लिए यह फैसला कितना कठिन होता है, यह उनके चेहरे की खामोशी और आंखों के आंसुओं से साफ झलकता है।
हरीश राणा की जिंदगी 2013 में एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी। दिल्ली में जन्मे हरीश Panjab University से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे।
पढ़ाई के अंतिम सेमेस्टर के दौरान हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें गंभीर चोट लगी। इसके बाद वह कोमा में चले गए और उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया।
डॉक्टरों के अनुसार हरीश क्वाड्रिप्लेजिया नाम की गंभीर स्थिति से पीड़ित थे, जिसमें मरीज पूरी तरह वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब पर निर्भर हो जाता है।
एम्स के मेडिकल बोर्ड ने हरीश की स्थिति की जांच के बाद उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया था। डॉक्टरों का कहना था कि उनकी हालत असाध्य है और ठीक होने की संभावना लगभग नहीं है।
इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी, जिसके तहत जीवनरक्षक उपकरण धीरे-धीरे हटाए जाते हैं ताकि मरीज प्राकृतिक रूप से जीवन त्याग सके।
परिवार ने भी साफ किया कि उन्हें किसी तरह का घातक इंजेक्शन नहीं दिया जाएगा, बल्कि सिर्फ फूड पाइप हटाई जाएगी और डॉक्टरों की निगरानी में पूरी प्रक्रिया होगी।
हरीश राणा की कहानी केवल एक मेडिकल केस नहीं, बल्कि एक परिवार की लंबी पीड़ा और संघर्ष की कहानी है। 13 साल तक बेटे को इस हालत में देखने के बाद परिवार ने बेहद कठिन निर्णय लिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने जहां हरीश को पीड़ा से मुक्ति का रास्ता दिया, वहीं इस मामले ने इच्छामृत्यु और मेडिकल नैतिकता पर एक नई बहस भी छेड़ दी है।
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