राजस्थान: में राज्य पशु ऊंट की लगातार घटती संख्या को लेकर Rajasthan High Court ने राज्य सरकार पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि ऊंटों के संरक्षण के लिए कानून बनने के बावजूद उनकी संख्या आधी रह गई है, लेकिन सरकार इस गंभीर मुद्दे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही।
जयपुर बेंच में इस मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि राज्य पशु होने के बावजूद ऊंटों की घटती संख्या चिंता का विषय है और सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। कोर्ट इस मामले में स्वप्रेरणा से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Pushpendra Singh Bhati और Vineet Mathur की खंडपीठ ने की।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया। इसके बाद अदालत ने अगली सुनवाई 29 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी।
अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि जब राज्य पशु के संरक्षण के लिए कानून बनाया गया था, तो उम्मीद थी कि इससे ऊंटों की संख्या बढ़ेगी। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई दे रही है।
मामले में न्यायमित्र अधिवक्ता Prateek Kasliwal ने अदालत को बताया कि वर्ष 2015 में राजस्थान सरकार ने ऊंट को राज्य पशु घोषित करते हुए इसके संरक्षण के लिए कानून बनाया था।
लेकिन इसके बाद भी ऊंटों की संख्या लगातार घटती गई।
उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2004 में राजस्थान में लगभग 7.5 लाख ऊंट थे।
2015 में जब कानून लागू हुआ, तब यह संख्या घटकर करीब 3.26 लाख रह गई।
इसके बाद भी गिरावट जारी रही।
कुछ वर्षों बाद यह संख्या घटकर 2.13 लाख रह गई और 2021 तक आते-आते करीब 1.5 लाख के आसपास पहुंच गई।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कानून बनने के बाद भी ऊंटों की आबादी में सुधार नहीं हुआ।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऊंटों की घटती संख्या के पीछे कई कारण हैं।
2015 में बनाए गए कानून के तहत ऊंटों की खरीद-फरोख्त और राज्य के बाहर ले जाने पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके चलते पशु मेलों में ऊंटों की बिक्री लगभग बंद हो गई।
इसके अलावा किसी ऊंट को एक जिले से दूसरे जिले या राज्य के बाहर ले जाने के लिए जिला कलेक्टर से अनुमति लेनी पड़ती है, जो काफी लंबी और जटिल प्रक्रिया है।
इस कारण कई पशुपालकों ने ऊंट पालन में रुचि कम कर दी है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ऊंट संरक्षण कानून मुख्य रूप से ऊंटों के वध को रोकने पर केंद्रित रहा है।
लेकिन अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे चरागाहों की कमी, ऊंटनी के दूध और अन्य उत्पादों के लिए बाजार विकसित करना और ऊंट पालकों को आर्थिक सहायता देना जैसे मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
यही कारण है कि ऊंट पालकों के लिए इस पेशे को जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है।
राज्य सरकार ने वर्ष 2022 में विधानसभा में एक सवाल के जवाब में स्वीकार किया था कि ऊंट संरक्षण कानून में संशोधन की जरूरत है।
सरकार का कहना था कि मौजूदा कानून के कारण पशुपालकों को कई व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि अब तक इस कानून में कोई ठोस संशोधन नहीं किया गया है।
ऊंट को अक्सर “रेगिस्तान का जहाज” कहा जाता है और यह राजस्थान की संस्कृति, पर्यटन और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
राजस्थान के प्रसिद्ध Pushkar Camel Fair में भी ऊंटों की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन अगर ऊंटों की संख्या इसी तरह घटती रही तो यह परंपरा और पर्यटन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
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