राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक बड़ी खामी सामने आई है। चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सेवाएं निदेशालय जयपुर ने राज्य के सभी 43 मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO) को 697 ऐसे डॉक्टरों की सूची भेजी है, जो लंबे समय से बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित हैं। इनमें बांसवाड़ा और उदयपुर के 20-20, डूंगरपुर के 11 तथा प्रतापगढ़ के 12 डॉक्टर शामिल हैं। इनमें से कई डॉक्टर एक साल से लेकर 10-12 साल तक अपनी ड्यूटी पर वापस नहीं लौटे हैं।
निदेशालय ने इस मामले को गंभीर लापरवाही मानते हुए सभी सीएमएचओ को निर्देश दिए हैं कि इन डॉक्टरों की तलाश कर उन्हें सेवा में लौटने का अंतिम अवसर दिया जाए। यदि वे निर्धारित समय में वापस नहीं लौटते हैं तो उनकी सेवाएं समाप्त करने की कार्रवाई की जाएगी।
आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि यह सरकारी आदेशों की अवहेलना और राजकार्य के प्रति गंभीर लापरवाही का मामला है। एक वर्ष से अधिक समय तक अनुपस्थित रहने वाले डॉक्टरों की सेवाएं समाप्त की जाएंगी। साथ ही यदि किसी डॉक्टर ने न्यायालय में वाद दायर किया है, तब भी उनसे बंध-पत्र राशि की वसूली की जाएगी। पहले नोटिस के बावजूद जवाब नहीं देने वाले डॉक्टरों पर सीधे सेवा समाप्ति की प्रक्रिया लागू होगी।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कई डॉक्टर एमबीबीएस के बाद सरकारी सेवा में शामिल हुए और बाद में पीजी (एमडी/एमएस) करने चले गए। सरकार ने पीजी अध्ययन अवधि के दौरान उन्हें वेतन का भुगतान किया, जिसे प्रशिक्षण खर्च माना गया। एक एमबीबीएस डॉक्टर का औसत मासिक वेतन लगभग 55 हजार रुपए है, यानी दो वर्षों में एक डॉक्टर पर लगभग 13.20 लाख रुपए खर्च किए गए।
सूत्रों के अनुसार, 697 अनुपस्थित डॉक्टरों में करीब 500 ऐसे हैं जो पीजी करने गए थे। सरकार ने इनके वेतन पर करीब 66 करोड़ रुपए खर्च किए, लेकिन पीजी पूरा करने के बाद नियम अनुसार वापस सरकारी सेवा जॉइन करने की बजाय कई डॉक्टर बेहतर पैकेज के कारण निजी अस्पतालों में चले गए। इनमें से कई डॉक्टरों ने इस्तीफा भी नहीं दिया ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर वे दोबारा सरकारी सेवा में लौट सकें। इसे नियमों के दुरुपयोग के रूप में देखा जा रहा है।
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