सिरोही। आमतौर पर काजू की खेती के लिए महाराष्ट्र, केरल, गोवा और कर्नाटक जैसे तटीय और नमी वाले क्षेत्र उपयुक्त माने जाते हैं, लेकिन राजस्थान की गर्म और शुष्क जलवायु में भी अब आधुनिक तकनीकों और केमिकल-फ्री फार्मिंग के दम पर काजू की सफल खेती हो रही है।
सिरोही जिले के आमथला में स्थित “तपोवन” परिसर में बीके ललनभाई और ब्रह्माकुमारी संस्थान की कृषि पहल के तहत काजू के बागान विकसित किए गए हैं। यहां पूरी तरह ऑर्गेनिक खेती की जाती है, जिसमें देशी खाद और आधुनिक सिंचाई प्रणालियों का उपयोग किया जाता है।
ग्राफ्टेड पौधों से 2–3 साल में फल मिलने लगते हैं। एक पेड़ पर 300–400 फल लगते हैं, जिससे 15–20 किलो कच्चे काजू का उत्पादन संभव होता है। काजू के इन पेड़ों पर डार्क रेड फल लगते हैं, जिनमें बीज नीचे की तरफ लटका होता है। बाद में इसे प्रोसेस करके स्वादिष्ट ड्राई काजू बनाया जाता है।
तपोवन में ड्रिप (टपक) सिंचाई पद्धति का उपयोग किया जाता है, जिससे पानी की बचत होती है और पौधों को सही मात्रा में पानी मिलता है। इस मॉडल को देखने और सीखने के लिए देशभर के किसान और कृषि अधिकारी सिरोही पहुंच रहे हैं।
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