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राजस्थान के 309 निकायों में BJP-कांग्रेस की साख दांव पर, युवा मतदाता बनेंगे गेमचेंजर!

जयपुर। राजस्थान के 309 शहरी निकायों के चुनाव प्रदेश की राजनीति के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। 10,245 वार्डों और करीब 1.4 करोड़ मतदाताओं से जुड़े इस चुनाव को भजनलाल सरकार के ढाई साल के कार्यकाल की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है। चुनाव के नतीजे न केवल शहरी मतदाताओं का राजनीतिक रुझान बताएंगे, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।

भजनलाल सरकार के कामकाज का होगा आकलन

राजस्थान में पहली बार 309 शहरी निकायों के चुनाव एक साथ कराए जाने की रणनीति ने मुकाबले को राज्यव्यापी राजनीतिक स्वरूप दिया। बीजेपी ने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंकी। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो और केंद्रीय मंत्रियों की सक्रियता ने पार्टी के चुनावी अभियान को गति दी। बीजेपी के लिए यह चुनाव शहरी क्षेत्रों में अपनी पारंपरिक पकड़ मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। वहीं, कांग्रेस के सामने खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने का अवसर है।

Gen Z मतदाताओं पर दोनों पार्टियों की नजर

इन चुनावों में युवा मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 18 से 25 वर्ष के मतदाता कुल मतदाताओं का करीब 14.7 प्रतिशत हैं, जबकि 26 से 35 वर्ष के मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 25.4 प्रतिशत है। ऐसे में 35 वर्ष तक के मतदाता चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने युवाओं को टिकट देकर नई पीढ़ी को राजनीति में आगे लाने की कोशिश की है।

पत्रकारिता की छात्रा और IAS अभ्यर्थी भी मैदान में

चुनाव में युवा उम्मीदवारों की भागीदारी भी चर्चा में रही। अलवर के थानागाजी से 21 वर्षीय नेहा जोशी बीजेपी की उम्मीदवार बनीं, जबकि जोधपुर के झालामंड क्षेत्र से 21 वर्षीय सरस्वती प्रजापत कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरीं। सरस्वती चुनाव से पहले IAS परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। इन युवा चेहरों की मौजूदगी ने शिक्षा, रोजगार और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया।

कांग्रेस का Gen Z अभियान, डिजिटल प्रचार पर जोर

कांग्रेस ने युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए 'Gen Z for Change' अभियान शुरू किया। पार्टी ने डिजिटल माध्यमों, सोशल मीडिया और युवा पेशेवरों के जरिए अपनी बात रखने की रणनीति अपनाई। दूसरी ओर, बीजेपी भी रील्स और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए शहरी युवाओं से जुड़ने में जुटी रही। हालांकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की सीमित सक्रियता को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं हुईं।

निर्दलीय उम्मीदवार भी बन सकते हैं निर्णायक

309 निकायों में बोर्ड और निगम बनाने के लिए बीजेपी और कांग्रेस को निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन भी अहम साबित हो सकता है। ऐसे में चुनाव के बाद होने वाली राजनीतिक जोड़तोड़ और स्थानीय स्तर पर गठबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।

कुल मिलाकर, राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव सिर्फ स्थानीय विकास और नगर प्रशासन तक सीमित नहीं हैं। ये चुनाव बीजेपी की शहरी पकड़, कांग्रेस की वापसी की संभावनाओं, भजनलाल सरकार के प्रति जनता के रुख और युवा मतदाताओं की राजनीतिक सोच का संकेत देने वाले हैं। इनके परिणाम आने वाले समय में राजस्थान की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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