अनिल सैनी ने लक्ष्मणगढ़ पंचायत समिति के वार्ड-4 से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया था। नामांकन खारिज होने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि नामांकन पत्र भरते समय मानवीय भूल हुई थी और रिटर्निंग ऑफिसर ने उनकी आपत्तियों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया। उन्होंने कोर्ट से नामांकन बहाल करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में बताया गया कि वर्ष 2018 में लक्ष्मणगढ़ थाने में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। इस मामले में अदालत ने 18 नवंबर 2021 को संज्ञान लिया था, जिसकी जानकारी नामांकन पत्र में दी गई थी।
याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार, मामले में आरोप तय नहीं हुए थे, लेकिन गलती से नामांकन पत्र के आरोप तय होने से संबंधित कॉलम में अदालत का नाम और संज्ञान लेने की तारीख दर्ज कर दी गई। इसी आधार पर रिटर्निंग ऑफिसर ने नामांकन खारिज कर दिया।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता कपिल प्रकाश माथुर ने पक्ष रखते हुए कहा कि चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद चुनाव प्रक्रिया में न्यायालय का हस्तक्षेप संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों से सीमित है।
सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि नामांकन पत्र में आरोप तय होने की तारीख का उल्लेख उम्मीदवार ने स्वयं किया था। नामांकन में दी गई जानकारी की जिम्मेदारी प्रत्याशी की होती है। यदि किसी उम्मीदवार को लगता है कि उसका नामांकन गलत तरीके से खारिज किया गया है, तो वह चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनाव याचिका दायर कर सकता है।
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इससे अनिल सैनी को नामांकन बहाल कराने के लिए दायर याचिका में राहत नहीं मिल सकी। पंचायत चुनाव से जुड़े इस मामले में अब आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया का विकल्प उपलब्ध हो सकता है।
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