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विश्व विरासत दिवस पर शर्मनाक सच! 500 साल पुराना मनसा माता मंदिर खंडहर में तब्दील—महंत की चेतावनी, “आखिरी दर्शन कर लीजिए”

विश्व विरासत दिवस: (World Heritage Day) के मौके पर जहां दुनिया अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने और संरक्षित करने की बात कर रही है, वहीं राजस्थान की राजधानी जयपुर से एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। जयपुर बसने से पहले आमेर घाटी में बना करीब 500 साल पुराना मनसा माता मंदिर अब जर्जर हालत में पहुंच चुका है और किसी भी समय गिर सकता है।

महंत की चेतावनी—‘आखिरी दर्शन कर लीजिए’

मंदिर की 16वीं पीढ़ी की महिला महंत सुष्मिता भट्टाचार्य ने सरकार और प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा है कि “आखिरी बार माता के दर्शन कर लीजिए, क्योंकि अगली बरसात तक यह मंदिर ढह सकता है।”
उन्होंने मंदिर की दीवारों पर भी चेतावनी लिखकर चस्पा कर दी है कि इमारत कभी भी गिर सकती है।

5 साल से लगा रही गुहार, नहीं मिली सुनवाई

महंत के अनुसार पिछले पांच वर्षों से लगातार सरकार, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों को पत्र लिखे जा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब मंदिर परिसर में भक्तों द्वारा जीर्णोद्धार का प्रयास किया गया, तो वन विभाग ने उस पर रोक लगा दी।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मंदिर के पास ही एक होटल-रिसोर्ट का निर्माण हो गया, लेकिन उस पर किसी भी विभाग ने आपत्ति नहीं जताई।

मंदिर की हालत बेहद खराब

मंदिर की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। छत से पानी टपक रहा है, पत्थरों की पट्टियां दरक चुकी हैं और दीवारों में दरारें साफ नजर आ रही हैं।
परिसर में मौजूद प्राचीन कुंड और कुएं भी ढहने की कगार पर हैं।

मंदिर तक जाने के लिए सही सड़क नहीं है, न ही वहां रोशनी की कोई व्यवस्था है। जंगल क्षेत्र में होने के कारण जंगली जानवरों और असामाजिक तत्वों का खतरा भी बना रहता है।

इतिहास और आस्था से जुड़ा मंदिर

जयगढ़ किले की तलहटी में स्थित यह मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां मां अंबा स्वरूपा मनसा माता विराजमान हैं, जिन्हें सर्पों की देवी के रूप में पूजा जाता है।

मान्यता है कि महाराजा मानसिंह प्रथम ने जयगढ़ किले की विजय से पहले यहां मन्नत मांगी थी। उनकी इच्छा पूरी होने के बाद मंदिर का नाम ‘मनसा पूरण’ पड़ा।

मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुंड भी है, जिसका पानी कभी खत्म नहीं होता और उसी जल से माता का अभिषेक किया जाता है।

16वीं पीढ़ी संभाल रही जिम्मेदारी

यह मंदिर करीब 4.6 बीघा क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी सेवा बांग्लादेश के जेसोर से आए बंगाली ब्राह्मण परिवार द्वारा पीढ़ियों से की जा रही है।
वर्तमान में महंत सुष्मिता भट्टाचार्य 2019 में अपने पति के निधन के बाद अकेले ही मंदिर की देखरेख कर रही हैं।

प्रशासन की उदासीनता पर सवाल

महंत ने बताया कि उन्होंने उपमुख्यमंत्री की जनसुनवाई में भी इस मुद्दे को उठाया था, साथ ही पूर्व मेयर और कई विधायकों को भी पत्र लिखे, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार यह क्षेत्र वन विभाग के अंतर्गत आता है, जिसे ग्रीन एरिया घोषित किया गया है। इसी जमीन पर मंदिर के साथ अन्य पुराने ढांचे भी मौजूद हैं, लेकिन संरक्षण के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई।


निष्कर्ष:

विश्व विरासत दिवस पर यह घटना एक कड़वी सच्चाई उजागर करती है—हमारी ऐतिहासिक धरोहरें उपेक्षा का शिकार हो रही हैं। मनसा माता मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास और आस्था का प्रतीक है। यदि जल्द संरक्षण के प्रयास नहीं किए गए, तो यह अनमोल धरोहर हमेशा के लिए खो सकती है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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