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जयपुर में डामर संकट से सड़क निर्माण महंगा, कचरे से सड़क बनाने पर जोर

जयपुर में डामर (बिटुमेन) की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के चलते सड़क निर्माण कार्य प्रभावित हो रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण पिछले तीन महीनों में डामर की कीमत लगभग दोगुनी होकर 45 हजार रुपये प्रति टन से बढ़कर करीब 85 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है। इससे प्रदेश में 5 हजार करोड़ रुपये से अधिक के सड़क निर्माण, मरम्मत और डामरीकरण कार्यों की गति धीमी पड़ गई है, जबकि कई परियोजनाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं।

इस संकट के बीच सड़क निर्माण क्षेत्र ने अब प्लास्टिक वेस्ट, फ्लाई ऐश और पुरानी सड़कों से निकली सामग्री के पुनः उपयोग पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। इस तकनीक से न केवल पर्यावरण संरक्षण संभव होगा, बल्कि निर्माण लागत में भी कमी आएगी। हालांकि पहले भी सीमित स्तर पर प्लास्टिक वेस्ट का उपयोग किया जा रहा था, लेकिन अब इसे बड़े पैमाने पर अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।

तमिलनाडु इस तकनीक में अग्रणी राज्य माना जाता है, जहां लगभग 17,735 किलोमीटर सड़कें कचरे के उपयोग से बनाई जा चुकी हैं। वहीं कर्नाटक में भी 2000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का सफल निर्माण किया गया है। हुबली-धारवाड़ में प्लास्टिक मिश्रित सड़क निर्माण से मजबूती बढ़ने के साथ प्रति किलोमीटर लगभग 1.5 लाख रुपये की बचत दर्ज की गई है।

जयपुर में भी इस विषय पर कार्यशाला आयोजित की जा चुकी है, और केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान द्वारा आधुनिक सड़क तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। नई दिल्ली में 7 से 12 सितंबर तक पांच दिवसीय प्रशिक्षण में इंजीनियरों को रीसाइक्लिंग और आधुनिक निर्माण तकनीकों की जानकारी दी जाएगी।

विशेषज्ञों के अनुसार सड़क निर्माण में कचरे का उपयोग न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है, जिससे भविष्य में निर्माण लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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