दुनिया: इस समय सिर्फ तेल और गैस संकट की चिंता में नहीं है, बल्कि एक और बड़ा खतरा तेजी से उभर रहा है—इंटरनेट ठप होने का जोखिम। मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर Strait of Hormuz के आसपास, अब वैश्विक डिजिटल नेटवर्क को भी प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है और समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो भारत समेत पूरी दुनिया में इंटरनेट स्पीड धीमी हो सकती है। यह असर आम यूजर्स से लेकर बड़े उद्योगों तक हर स्तर पर महसूस किया जाएगा।
अक्सर यह धारणा होती है कि इंटरनेट सैटेलाइट के जरिए चलता है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। दुनिया का करीब 95 से 97 प्रतिशत डेटा समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए ट्रांसफर होता है। ये केबल्स महाद्वीपों को जोड़ती हैं और वैश्विक डिजिटल संचार की रीढ़ हैं।
Strait of Hormuz के आसपास कई महत्वपूर्ण केबल सिस्टम गुजरते हैं, जो एशिया को यूरोप, अफ्रीका और पश्चिम एशिया से जोड़ते हैं। इनमें प्रमुख नेटवर्क शामिल हैं:
भारत का अधिकांश इंटरनेशनल इंटरनेट ट्रैफिक अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र के जरिए गुजरता है। ऐसे में अगर इस रूट पर कोई बाधा आती है, तो इसका सीधा असर देश की डिजिटल सेवाओं पर पड़ेगा।
सबसे पहले लेटेंसी बढ़ेगी, यानी डेटा को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में ज्यादा समय लगेगा। इससे वीडियो कॉल, ऑनलाइन गेमिंग और क्लाउड सेवाओं में देरी महसूस होगी।
दूसरा बड़ा असर इंटरनेट स्पीड पर पड़ेगा। YouTube, Instagram और Netflix जैसे प्लेटफॉर्म्स पर बफरिंग बढ़ सकती है, जिससे यूजर एक्सपीरियंस खराब होगा।
भारत का IT और आउटसोर्सिंग सेक्टर लगभग 250 बिलियन डॉलर का है। यह सेक्टर अमेरिका और यूरोप के क्लाइंट्स के साथ रियल-टाइम डेटा एक्सचेंज पर निर्भर करता है। अगर इंटरनेट धीमा होता है, तो कंपनियों के सर्विस लेवल एग्रीमेंट (SLA) टूट सकते हैं और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम, जैसे SWIFT, और खाड़ी देशों से आने वाली रेमिटेंस भी प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी तरह इंटरनेट बंद होने की संभावना बहुत कम है। इंटरनेट का नेटवर्क इस तरह डिजाइन किया गया है कि अगर एक रास्ता बंद हो जाए, तो डेटा दूसरे रास्तों से भेजा जा सकता है।
हालांकि, जब ट्रैफिक को लंबा रास्ता—जैसे पैसिफिक रूट—से भेजा जाएगा, तो उस पर लोड बढ़ेगा। इससे स्पीड कम हो सकती है और खासकर शेयर बाजार व हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग जैसे सेक्टर्स में बड़ा जोखिम पैदा हो सकता है।
इस खतरे को देखते हुए कई देश वैकल्पिक इंटरनेट रूट्स पर निवेश कर रहे हैं। सैटेलाइट इंटरनेट भी एक बैकअप विकल्प के रूप में उभर रहा है।
Elon Musk की Starlink जैसी सेवाएं भविष्य में ऐसे संकटों के दौरान मददगार साबित हो सकती हैं। हालांकि, अभी भी फाइबर ऑप्टिक केबल्स ही सबसे तेज और भरोसेमंद माध्यम हैं।
अब तक Strait of Hormuz को सिर्फ ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से अहम माना जाता था, लेकिन अब यह एक “डिजिटल चोकपॉइंट” भी बन चुका है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव अब सिर्फ तेल की कीमतों को ही नहीं, बल्कि पूरी डिजिटल दुनिया को प्रभावित कर सकता है।
होर्मुज में बढ़ता तनाव दुनिया के लिए दोहरी चुनौती बनता जा रहा है—ऊर्जा संकट और डिजिटल संकट। हालांकि पूरी तरह इंटरनेट बंद होने की संभावना कम है, लेकिन स्पीड और कनेक्टिविटी पर असर तय माना जा रहा है। ऐसे में सरकारों और टेक कंपनियों के लिए जरूरी है कि वे सुरक्षित और वैकल्पिक नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर पर तेजी से काम करें, ताकि भविष्य में ऐसे खतरों से बचा जा सके।
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