राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक निजी अस्पताल से जुड़ा बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है, जहां मरीजों के दस्तावेजों में कथित तौर पर हेरफेर कर सरकारी योजना के तहत क्लेम हासिल करने की कोशिश की गई। इस मामले में पुलिस ने सख्त कार्रवाई करते हुए अस्पताल संचालक को गिरफ्तार कर लिया है।
मानसरोवर थाना पुलिस के अनुसार आरोपी की पहचान डॉ. सोमदेव बंसल (45) के रूप में हुई है, जो मानसरोवर स्थित निविक हॉस्पिटल का संचालन करते हैं। पुलिस ने रविवार दोपहर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और उससे पूछताछ जारी है।
मामले की शुरुआत सितंबर 2025 में हुई थी, जब एडवोकेट जितेंद्र शर्मा ने अपनी मां के इलाज के दौरान लापरवाही का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि जांच के दौरान चिकित्सा लापरवाही की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन दस्तावेजों में गड़बड़ी का बड़ा मामला सामने आ गया।
पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि अस्पताल प्रबंधन ने मरीज को बार-बार डिस्चार्ज दिखाकर दोबारा भर्ती दर्शाया। इससे इलाज की अवधि और खर्च को बढ़ाकर दिखाया गया। इतना ही नहीं, एक ही कंसेंट फॉर्म में काट-छांट कर अलग-अलग तारीखें डालकर उसे कई बार इस्तेमाल किया गया।
इन दस्तावेजों को बाद में Rajasthan Government Health Scheme (RGHS) की वेबसाइट पर अपलोड किया गया, जिससे फर्जी क्लेम की संभावना बनी। इस पूरे मामले की जांच RGHS कार्यालय द्वारा भी की गई, जिसमें अस्पताल के खिलाफ अनियमितताएं प्रमाणित पाई गईं।
मामले को और पुख्ता करने के लिए दस्तावेजों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया। FSL (फॉरेंसिक साइंस लैब) की रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर दस्तावेजों में छेड़छाड़ की पुष्टि हुई। इसके बाद पुलिस ने आरोपी डॉक्टर के खिलाफ ठोस सबूतों के आधार पर कार्रवाई करते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया।
इस केस ने तब और तूल पकड़ लिया था, जब FIR दर्ज होने के बावजूद पुलिस कार्रवाई में देरी हुई। इससे नाराज वकीलों ने हाईकोर्ट रोड पर प्रदर्शन किया और सड़क जाम कर विरोध जताया। प्रदर्शन के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच तेज की।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी डॉक्टर ने कई मरीजों के दस्तावेजों में इसी तरह की हेराफेरी की थी। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि यह मामला केवल एक मरीज तक सीमित नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा किया गया हो सकता है।
SHO लखन सिंह खटाना ने बताया कि आरोपी से पूछताछ जारी है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस फर्जीवाड़े में और कौन-कौन शामिल है। साथ ही RGHS के तहत किए गए सभी क्लेम्स की जांच भी की जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों से सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। RGHS जैसी योजनाएं आम जनता को सस्ती और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए बनाई गई हैं, लेकिन अगर इस तरह की अनियमितताएं होती हैं तो इसका सीधा नुकसान सरकार और मरीजों दोनों को होता है।
इस घटना ने एक बार फिर निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन इस तरह के मामलों पर सख्त निगरानी रखें और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
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