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हर 52 मिनट में छेड़छाड़! कानून सख्त फिर भी मनचले बेखौफ—40% केस ‘झूठे’ बताकर बंद

राजस्थान: में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में औसतन हर 52 मिनट में एक महिला छेड़छाड़ का शिकार हो रही है। चिंताजनक बात यह है कि सख्त कानून होने के बावजूद अधिकतर मामलों में आरोपी सजा से बच निकलते हैं। इसका मुख्य कारण सिस्टम की सुस्ती, लंबी न्यायिक प्रक्रिया और जांच में खामियां बताई जा रही हैं।

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, जनवरी 2026 में छेड़छाड़ के 903 मामले दर्ज हुए, जो दिसंबर 2025 की तुलना में 76.12 प्रतिशत अधिक हैं। अगर पूरे वर्ष 2025 की बात करें, तो कुल 10,371 मामले सामने आए। इसका मतलब है कि हर दिन औसतन 28 से 29 महिलाएं इस अपराध का शिकार हो रही हैं। यह आंकड़े न केवल डराने वाले हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि महिला सुरक्षा को लेकर किए जा रहे दावे जमीनी स्तर पर कमजोर पड़ रहे हैं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि लगभग 40 प्रतिशत मामलों को थानों में ‘झूठा’ बताकर बंद कर दिया जाता है। इससे न केवल पीड़िताओं को न्याय से वंचित होना पड़ता है, बल्कि अपराधियों के हौसले भी बुलंद होते हैं। कई मामलों में पीड़िताएं सामाजिक दबाव, लंबी कानूनी प्रक्रिया और पुलिस के रवैये के कारण आगे कार्रवाई करने से पीछे हट जाती हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में छेड़छाड़ के मामलों में अधिकतम 5 साल की सजा का प्रावधान है, लेकिन हकीकत में आधे से ज्यादा मामलों में दोषियों को केवल 6 महीने से 2 साल तक की सजा मिलती है। इसका कारण यह है कि अधिकांश मामलों की सुनवाई सामान्य मजिस्ट्रेट अदालतों में होती है, जहां फैसले आने में 5-6 साल तक का समय लग जाता है।

दिलचस्प बात यह भी है कि सजा का स्तर अदालत के क्षेत्राधिकार पर भी निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई मामला सीनियर डिवीजन कोर्ट में जाता है, तो अधिकतम 5 साल की सजा दी जा सकती है, जबकि जूनियर डिवीजन कोर्ट में यह सीमा 3 साल तक ही सीमित रहती है। इससे भी कई मामलों में अपराधियों को कम सजा मिलती है।

वरिष्ठ अधिवक्ता निधि खंडेलवाल के अनुसार, “रेप और पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में जांच और ट्रायल के लिए समयसीमा तय है, लेकिन छेड़छाड़ के मामलों को अक्सर हल्के में लिया जाता है। इससे पीड़िताओं को न्याय मिलने में देरी होती है।” वहीं, एडवोकेट अभिषेक पाराशर का कहना है कि छेड़छाड़ के मामलों में भी समयबद्ध जांच और फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था जरूरी है, ताकि पीड़िताओं को जल्द न्याय मिल सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चलने वाले केस के कारण गवाह मुकर जाते हैं और पीड़िताएं मानसिक रूप से थक जाती हैं। इसका सीधा फायदा आरोपियों को मिलता है। ऐसे में जरूरत है कि न्यायिक प्रक्रिया को तेज किया जाए और पुलिस जांच को मजबूत बनाया जाए।

महिला सुरक्षा को लेकर सरकार और प्रशासन लगातार दावे करते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। अगर समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।


निष्कर्ष:

छेड़छाड़ के बढ़ते मामले और कम सजा दर यह साफ दर्शाते हैं कि केवल सख्त कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक जांच प्रक्रिया मजबूत नहीं होगी और न्यायिक प्रणाली तेज नहीं होगी, तब तक महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल रहेगा। अब समय है कि सिस्टम में सुधार कर पीड़िताओं को न्याय दिलाया जाए।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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