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बिना सुनवाई दिया गया आदेश रद्द! Rajasthan High Court का बड़ा फैसला—CGST अपील पर फिर होगी सुनवाई

Rajasthan High Court: की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को प्राथमिकता देते हुए CGST अपीलीय प्राधिकारी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जो बिना नोटिस और सुनवाई के पारित किया गया था। कोर्ट ने मामले को पुनः अपीलीय प्राधिकारी के पास भेजते हुए कंपनी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देने के निर्देश दिए हैं।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला Balotra स्थित Acme Solar Holdings Limited से जुड़ा है। कंपनी ने अपने अधिकृत प्रतिनिधि संजय कुमार गौड़ के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।

याचिका में कहा गया कि असेसिंग ऑफिसर ने 26 जुलाई 2024 को कंपनी के पक्ष में एक ‘रीजनिंग ऑर्डर’ पारित किया था। हालांकि, इस आदेश से असंतुष्ट होकर CGST विभाग ने अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील दायर कर दी।

अपील प्रक्रिया में बड़ी चूक

कंपनी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि अपील प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। न तो अपील से संबंधित कोई आदेश पोर्टल पर अपलोड किया गया और न ही कंपनी को कोई नोटिस या सूचना भेजी गई।

इसके बावजूद अपीलीय प्राधिकारी ने 18 दिसंबर 2025 को कंपनी की अनुपस्थिति में ही मूल आदेश को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया।

कोर्ट ने उठाए सख्त सवाल

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस Arun Monga और जस्टिस Sunil Beniwal की खंडपीठ ने प्रतिवादी CGST विभाग से प्रक्रिया को लेकर सवाल किए।

इस पर विभाग के वकील ने समय मांगा और बाद में निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया कि यदि विवादित आदेश को रद्द कर दिया जाए और मामले को पुनः सुनवाई के लिए भेजा जाए, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

हाईकोर्ट का अहम फैसला

दोनों पक्षों की दलीलों और प्रतिवादी की सहमति के बाद हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 2025 के अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि मामले को दोबारा अपीलीय प्राधिकारी के पास भेजा जाए।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अपीलीय प्राधिकारी याचिकाकर्ता को विधिवत नोटिस जारी करे और उसे कम से कम दो सप्ताह का समय दिया जाए, ताकि वह अपनी बात रख सके।

‘स्पीकिंग ऑर्डर’ देने का निर्देश

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अपीलीय प्राधिकारी सुनवाई के बाद एक ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ पारित करे। इसका मतलब है कि आदेश में सभी तथ्यों, तर्कों और कानूनी पहलुओं का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आवश्यक हो, तो प्राधिकारी एक से अधिक सुनवाई के अवसर भी दे सकता है, ताकि निष्पक्ष निर्णय सुनिश्चित हो सके।

प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण?

यह फैसला इस बात को दोहराता है कि किसी भी प्रशासनिक या न्यायिक प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है। इसमें ‘सुनवाई का अधिकार’ सबसे महत्वपूर्ण होता है।

बिना नोटिस और सुनवाई के कोई भी आदेश पारित करना न केवल अनुचित है, बल्कि कानूनी रूप से भी अस्वीकार्य माना जाता है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला टैक्स मामलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो और सभी को अपनी बात रखने का अवसर मिले।


निष्कर्ष

Rajasthan High Court का यह फैसला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की मजबूती को दर्शाता है। बिना सुनवाई के पारित आदेश को रद्द कर कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि हर पक्ष को न्याय पाने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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