राजस्थान: में किन्नर (ट्रांसजेंडर) समुदाय को लेकर एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। Rajasthan High Court की जोधपुर मुख्यपीठ ने राज्य सरकार द्वारा किन्नर समुदाय को ओबीसी सूची में शामिल करने को “महज दिखावा” करार देते हुए सख्त टिप्पणी की है।
खंडपीठ, जिसमें Justice Arun Monga और Justice Yogendra Kumar Purohit शामिल थे, ने अपने फैसले में कहा कि यह कदम किन्नर समुदाय को कोई वास्तविक लाभ नहीं देता और केवल औपचारिकता भर है।
यह मामला जालोर जिले की गंगा कुमारी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने किन्नर समुदाय के लिए अलग क्षैतिज आरक्षण की मांग की थी। इससे पहले भी इस मुद्दे पर याचिकाएं दायर हो चुकी थीं, जिनमें कोर्ट ने NALSA Judgment के आधार पर सरकार को उचित व्यवस्था करने का निर्देश दिया था।
हालांकि, राज्य सरकार ने 12 जनवरी 2023 को अधिसूचना जारी कर किन्नरों को ओबीसी सूची में शामिल कर दिया, जिसे अब कोर्ट ने अपर्याप्त बताया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किन्नरों को ओबीसी सूची में शामिल करना एक “खोखला कदम” है, क्योंकि इससे उन्हें वास्तविक आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इतनी कम आबादी (करीब 16,517) के कारण रोस्टर सिस्टम में उनका नंबर बहुत कम आएगा, जिससे यह व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है।
अदालत ने एक अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया कि जब तक सरकार नई और प्रभावी नीति नहीं बनाती, तब तक किन्नर उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक प्रवेश में 3 प्रतिशत अतिरिक्त अंक (additional weightage) दिया जाए।
यह आदेश किन्नर समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है, जो उन्हें प्रतिस्पर्धा में बेहतर अवसर प्रदान करेगा।
Rajasthan High Court ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित करे। इस समिति में समाजसेवियों और किन्नर समुदाय के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा।
समिति का काम होगा किन्नर समुदाय के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन का अध्ययन कर एक ठोस और प्रभावी आरक्षण नीति तैयार करना।
याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि मौजूदा व्यवस्था में किन्नर व्यक्ति को अपनी मूल श्रेणी (SC/ST/OBC) और किन्नर श्रेणी में से एक चुनना पड़ता है, जो उनके लिए नुकसानदायक है।
वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि आरक्षण नीति बनाना कार्यपालिका का विषय है और इस पर अंतिम निर्णय सरकार का होता है। हालांकि कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए हस्तक्षेप जरूरी बताया।
कोर्ट ने Transgender Persons (Protection of Rights) Act 2019 का हवाला देते हुए कहा कि सरकार का दायित्व है कि वह किन्नर समुदाय के अधिकारों की रक्षा करे और उन्हें समान अवसर प्रदान करे।
साथ ही अदालत ने कर्नाटक सरकार के मॉडल का भी जिक्र किया, जिसमें हर श्रेणी में किन्नरों के लिए अलग से 1 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है।
फैसले के अंत में कोर्ट ने प्रस्तावित Transgender Persons Amendment Bill 2026 पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यदि इस विधेयक में आत्म-पहचान का अधिकार कमजोर किया जाता है, तो यह किन्नर समुदाय के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ होगा।
Rajasthan High Court का यह फैसला किन्नर समुदाय के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल औपचारिक कदम पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि वास्तविक और प्रभावी नीतियों की जरूरत है। 3% अतिरिक्त अंक का अंतरिम आदेश फिलहाल राहत जरूर देता है, लेकिन अब नजर सरकार की नई नीति पर टिकी है, जो इस समुदाय के भविष्य को दिशा देगी।
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