गुरुग्राम: में तीन साल की बच्ची के साथ कथित दुष्कर्म के मामले में पुलिस और बाल कल्याण समिति (CWC) के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि पीड़ित बच्ची को थाने बुलाना “शर्मनाक” और “असंवेदनशील” है।
मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया—“पुलिस पीड़ित के घर क्यों नहीं जा सकती? क्या वे राजा हैं?” अदालत की यह टिप्पणी पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हरियाणा कैडर की महिला आईपीएस अधिकारियों सहित तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करने का आदेश दिया है। साथ ही राज्य सरकार को एक विशेष जांच टीम (SIT) बनाने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने गुरुग्राम पुलिस को आदेश दिया कि वह पूरे मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड तुरंत पेश करे।
यह मामला फरवरी 2026 में सामने आया, जब एक पिता ने गुरुग्राम के सेक्टर-53 थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, उनकी तीन वर्षीय बेटी के साथ दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच उनकी सोसाइटी में काम करने वाली दो घरेलू सहायिकाओं और एक पुरुष ने यौन उत्पीड़न किया।
शिकायत के आधार पर पुलिस ने पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत मामला दर्ज किया। हालांकि, शुरुआत से ही पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे। आरोप है कि पुलिस ने समय पर गिरफ्तारी नहीं की और जांच में गंभीर लापरवाही बरती।
बताया गया कि शुरुआती जांच में दो महिलाओं को हिरासत में लिया गया, लेकिन तुरंत गिरफ्तारी नहीं हुई। साथ ही, एक पुरुष आरोपी का नाम प्रारंभिक FIR में शामिल नहीं किया गया था, जिससे मामले की निष्पक्षता पर सवाल उठे।
पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिस ने न तो समय पर CCTV फुटेज जुटाए और न ही पर्याप्त साक्ष्य एकत्र किए। आरोपियों की गिरफ्तारी में भी देरी हुई। इस कारण परिवार ने मामले को बाल कल्याण समिति तक पहुंचाया और बाद में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
याचिका में स्वतंत्र जांच एजेंसी जैसे CBI या SIT से जांच की मांग की गई थी। परिवार का कहना था कि हरियाणा पुलिस की जांच निष्पक्ष और संतोषजनक नहीं है।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इस मामले को अदालत के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि पीड़ित बच्ची को बार-बार थाने, CWC और मेडिकल जांच के लिए बुलाया गया, जो कानून और संवेदनशीलता दोनों के खिलाफ है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि एक मजिस्ट्रेट ने आरोपी की मौजूदगी में बंद कमरे में करीब 30 मिनट तक बच्ची का बयान दर्ज किया। इस पर अदालत ने इसे “शॉकिंग” और “इंसेंसिटिव” करार दिया।
कोर्ट ने हरियाणा सरकार और राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को नोटिस जारी किया है। साथ ही गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारी को अदालत में पेश होकर जवाब देने के निर्देश दिए गए हैं।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद पुलिस ने 22 मार्च 2026 को तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें दो महिलाएं और एक पुरुष शामिल हैं, जो क्रमशः उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के निवासी बताए गए हैं। पुलिस के अनुसार, पुरुष आरोपी एक महिला का पति है।
हालांकि, गिरफ्तारी में देरी को लेकर अब भी सवाल उठ रहे हैं और यह जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और पूछा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। इसके साथ ही बाल कल्याण समिति के सदस्यों को भी नोटिस जारी कर यह पूछा गया है कि उन्हें उनके पद से क्यों न हटाया जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों से जुड़े ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और कानून के प्रावधानों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
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