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सांवरिया सेठ मंदिर में बड़ा बदलाव! अब नहीं चढ़ेगा 56 भोग और मोरपंख—आखिर क्यों बदली सदियों पुरानी परंपरा?

राजस्थान: के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित प्रसिद्ध श्री सांवरिया सेठ मंदिर में अब दर्शन व्यवस्था को लेकर बड़ा बदलाव किया गया है। यह मंदिर अपनी अपार आस्था, चमत्कारिक मान्यताओं और भारी दानराशि के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। लेकिन अब यहां सदियों से चली आ रही कुछ परंपराओं पर रोक लगा दी गई है, जिससे भक्तों के बीच चर्चा तेज हो गई है।

मंदिर प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से ‘56 भोग’ चढ़ाने और मोरपंख अर्पित करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह फैसला अचानक जरूर लगता है, लेकिन इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण बताए जा रहे हैं।

क्यों बंद हुआ 56 भोग?

मंदिर में हर दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। खासकर त्योहारों और विशेष अवसरों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में जब कोई भक्त ‘56 भोग’ चढ़ाता था, तो पूरी प्रक्रिया में करीब एक घंटा लग जाता था।

दिनभर में 3-4 बार ऐसा होने पर दर्शन की लाइन बार-बार रुक जाती थी, जिससे आम श्रद्धालुओं को काफी परेशानी होती थी। कई बार लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता था।

इसी समस्या को देखते हुए मंदिर मंडल ने यह फैसला लिया कि अब निजी रूप से 56 भोग की परंपरा को बंद किया जाए, ताकि दर्शन व्यवस्था सुचारू बनी रहे और सभी भक्तों को समय पर दर्शन मिल सकें।

मोरपंख पर भी लगी रोक

केवल 56 भोग ही नहीं, बल्कि भगवान को मोरपंख चढ़ाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। इसके पीछे स्वच्छता और शुद्धता सबसे बड़ी वजह बताई गई है।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, बाजार में मिलने वाले कई मोरपंख प्लास्टिक या मिलावटी सामग्री से बने होते हैं, जिससे मंदिर परिसर की पवित्रता और साफ-सफाई प्रभावित होती है।

इसी को ध्यान में रखते हुए गर्भगृह की स्वच्छता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।

अब कैसे होगा भोग अर्पण?

मंदिर प्रशासन ने भक्तों के लिए एक नया विकल्प भी दिया है। अब श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित काउंटर से रसीद कटवाकर ‘राजभोग’ या ‘बालभोग’ का हिस्सा बन सकते हैं।

इससे एक ओर जहां भोग की परंपरा भी बनी रहेगी, वहीं दूसरी ओर किसी एक व्यक्ति के कारण हजारों लोगों की लाइन प्रभावित नहीं होगी।

तिरुपति मॉडल पर व्यवस्थाएं

मंदिर मंडल के अध्यक्ष हाजरी दास वैष्णव ने बताया कि अब मंदिर में व्यवस्थाएं देश के प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर की तर्ज पर विकसित की जा रही हैं।

इसका उद्देश्य यह है कि बढ़ती भीड़ के बावजूद दर्शन व्यवस्था व्यवस्थित, तेज और पारदर्शी बनी रहे।

तिरुपति मंदिर की तरह यहां भी कतार प्रबंधन, समयबद्ध दर्शन और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

सबसे अमीर मंदिरों में शुमार

श्री सांवरिया सेठ मंदिर को राजस्थान के सबसे समृद्ध मंदिरों में गिना जाता है। यहां हर महीने करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है।

इस मंदिर की एक खास मान्यता यह भी है कि भक्त भगवान को अपने व्यापार का ‘पार्टनर’ मानते हैं और मुनाफे का एक हिस्सा यहां दान करते हैं।

इसी वजह से यह मंदिर व्यापारियों और उद्यमियों के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।

भक्तों की प्रतिक्रिया

नियमों में इस बदलाव को लेकर भक्तों की प्रतिक्रिया मिली-जुली है। कुछ लोग इसे परंपरा में हस्तक्षेप मान रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस फैसले का समर्थन कर रहे हैं।

उनका कहना है कि अगर इससे दर्शन व्यवस्था बेहतर होती है और समय की बचत होती है, तो यह कदम सही है।


निष्कर्ष:

सांवरिया सेठ मंदिर में किया गया यह बदलाव परंपरा और आधुनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। जहां एक ओर सदियों पुरानी मान्यताओं में बदलाव हुआ है, वहीं दूसरी ओर लाखों श्रद्धालुओं की सुविधा को प्राथमिकता दी गई है। आने वाले समय में यह मॉडल अन्य बड़े मंदिरों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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