राजस्थान के ग्रामीण और शहरी सियासी गलियारों में लंबे समय से चल रहे पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के सस्पेंस पर राजस्थान हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने प्रदेश में समय पर पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय चुनाव नहीं कराए जाने के खिलाफ दायर अवमानना याचिकाओं को खारिज कर दिया है। जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने मामले की विस्तृत कानूनी समीक्षा के बाद याचिकाओं को पूरी तरह निराधार माना। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को आगामी 31 जुलाई 2026 तक हर हाल में चुनावी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
इस फैसले से एक ओर राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को अवमानना कार्रवाई से राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर चुनाव प्रक्रिया को लेकर प्रशासनिक स्तर पर गतिविधियां तेज होने की संभावना बढ़ गई है। कोर्ट के निर्देश के बाद अब संबंधित विभागों और प्रशासनिक अमले के सामने तय समयसीमा के भीतर चुनावी तैयारियां पूरी करने की चुनौती होगी।
मामले की पृष्ठभूमि में पिछले वर्ष नवंबर 2025 में राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा प्रदेश की करीब 439 जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने उस समय 31 दिसंबर 2025 तक वार्ड परिसीमन और सीमांकन की प्रक्रिया पूरी करने तथा 15 अप्रैल 2026 से पहले चुनाव संपन्न कराने के आदेश दिए थे। लेकिन निर्धारित समयसीमा बीत जाने के बावजूद चुनाव नहीं हो सके। इसके बाद विपक्ष और याचिकाकर्ताओं ने इसे अदालत के आदेश की अवहेलना बताते हुए हाई कोर्ट में अवमानना याचिकाएं दायर की थीं।
कांग्रेस के पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज सिंह देवंदा ने सरकार के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। इसी मामले में पिछले महीने हाई कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था। अब अदालत के ताजा फैसले के बाद चुनावी प्रक्रिया को लेकर स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो गई है और प्रदेश में पंचायत एवं निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है।
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