झुंझुनूं जिले की ग्राम पंचायत इस्लामपुर इन दिनों एक बड़े सामाजिक और भावनात्मक विवाद के केंद्र में है। इस गांव का नाम बदलकर 'श्रीरामपुर' करने का प्रस्ताव सामने आया है, जिसके बाद से यहां के निवासियों में काफी बेचैनी और विरोध का माहौल है। लगभग 15,000 की आबादी वाला यह गांव झुंझुनूं का सबसे बड़ा राजस्व गांव माना जाता है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व: ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल नाम बदलने का मामला नहीं है, बल्कि यह उनकी 400 साल पुरानी विरासत और इतिहास से जुड़ी पहचान का प्रश्न है। इस गांव की स्थापना 16वीं सदी में हुई थी। यहाँ के पठान परिवार खुद को महाराणा प्रताप के वीर सेनापति हकीम खां सूरी का वंशज मानते हैं, जो इस क्षेत्र की गहरी ऐतिहासिक जड़ों को दर्शाता है।
देशसेवा और सामाजिक सौहार्द: इस्लामपुर अपनी देशभक्ति के लिए भी जाना जाता है। यहाँ के अनेक सपूतों ने भारतीय सेना में सेवा दी है। कर्नल अब्दुल रसूल खान, जिन्हें 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में शौर्य के लिए विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था, इसी मिट्टी के लाल थे। इसके अलावा, गांव में हिंदू-मुस्लिम सद्भाव की एक लंबी परंपरा रही है। गांव के बसावट के समय से ही यहाँ मस्जिद के साथ मंदिर भी स्थापित किया गया था, और सूफी संत हजरत इरादतुल्लाह शाह साहब की दरगाह यहाँ की सामाजिक समरसता का प्रमुख केंद्र है, जहाँ सभी धर्मों के लोग श्रद्धा के साथ आते हैं।
विरोध और आगामी आंदोलन: नाम परिवर्तन के प्रस्ताव का ग्रामीण पुरजोर विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों का मानना है कि नाम बदलने से उनकी दशकों पुरानी मिली-जुली संस्कृति पर खतरा मंडराएगा। इस विरोध के चलते ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है और अपनी मांगों को मजबूती से रखने के लिए 15 जून को गांव से कलक्ट्रेट तक पैदल मार्च निकालने का निर्णय लिया है। शुक्रवार को हुई एक बैठक में ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी स्थिति में अपने गांव का नाम नहीं बदलने देंगे।
निष्कर्ष: यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक समुदाय की सामूहिक स्मृतियों और विरासत के संरक्षण की लड़ाई बन गया है। अब देखना यह है कि प्रशासन ग्रामीणों की इस भावनाओं और उनके ऐतिहासिक तर्कों पर क्या प्रतिक्रिया देता है।
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