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रेतीली झोंपड़ी से सफलता तक, सरकारी शिक्षक बने धर्मेंद्र जाणी की प्रेरक कहानी

बालोतरा जिले के कालेवा गांव के रहने वाले धर्मेंद्र जाणी ने यह साबित कर दिया है कि सफलता पाने के लिए महंगी कोचिंग या आधुनिक सुविधाओं की नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और निरंतर मेहनत की जरूरत होती है। तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा में 196.33 अंक प्राप्त कर राज्य में 1380वीं रैंक हासिल करने वाले धर्मेंद्र आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।

धर्मेंद्र का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। कोरोना काल में आर्थिक तंगी के कारण उन्हें रिफाइनरी में मजदूरी करनी पड़ी, इसके बाद अहमदाबाद की एक कपड़ा फैक्ट्री में काम कर उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाली। इसी दौरान उनके रिश्तेदार के शिक्षक बनने से उन्हें भी शिक्षक बनने की प्रेरणा मिली। उनके 57 वर्षीय पिता वालाराम जाणी ने कठिन परिस्थितियों में मजदूरी कर बेटे की पढ़ाई का खर्च उठाया और परिवार ने कई आर्थिक चुनौतियों का सामना किया।

आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण धर्मेंद्र बड़े कोचिंग संस्थानों में नहीं जा सके, इसलिए उन्होंने सेल्फ स्टडी को ही अपना माध्यम बनाया। वर्ष 2022 में उन्होंने अपने गांव के पास रेतीले धोरे पर घास-फूस और लकड़ियों से एक छोटी सी झोंपड़ी बनाकर उसे ही अपनी पढ़ाई की पाठशाला बना लिया। उसी झोंपड़ी में बैठकर उन्होंने तपती गर्मी और सर्द हवाओं के बीच लगातार मेहनत की और अपने सपनों को साकार किया।

संघर्ष के दिनों में कई बार उनके पास मोबाइल फोन तक नहीं होता था। परीक्षा परिणाम आने के दिन भी वे अपने पिता को तुरंत सूचना नहीं दे पाए क्योंकि उनके पास बैलेंस तक नहीं था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। लगातार मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने यह बड़ी उपलब्धि हासिल की।

धर्मेंद्र अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता के त्याग, परिवार के समर्थन, रिश्तेदार गुमनाराम जाणी की प्रेरणा और शिक्षक खुमाराम गोदारा के मार्गदर्शन को देते हैं। उनकी यह कहानी आज उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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