राजस्थान में कैंसर उपचार के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक तेजी से बदलाव ला रही है। अब पारंपरिक "सबके लिए एक जैसी दवा" वाले मॉडल की जगह मरीजों की जेनेटिक प्रोफाइल के आधार पर पर्सनलाइज्ड मेडिसिन का उपयोग बढ़ रहा है। इस नई तकनीक के माध्यम से मरीज के जीन और कैंसर के प्रकार के अनुसार उपचार तय किया जा रहा है। वर्तमान में प्रदेश में हर महीने 500 से अधिक मरीज इस तकनीक से उपचार ले रहे हैं, जिनमें लंग्स, ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों की संख्या सबसे अधिक बताई जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार पारंपरिक कीमोथेरेपी शरीर की सामान्य कोशिकाओं को भी प्रभावित करती है, जबकि टारगेट थैरेपी सीधे कैंसर कोशिकाओं पर प्रभाव डालती है। इससे मरीजों में साइड इफेक्ट कम देखने को मिलते हैं और रिकवरी की संभावना बेहतर रहती है। राजस्थान में बढ़ते कैंसर मामलों के बीच यह तकनीक मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर सामने आ रही है।
प्रदेश में फिलहाल सरकारी स्तर पर मॉलिक्यूलर लैब की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों को जीन टेस्टिंग के लिए दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। मरीज जांच रिपोर्ट लेकर आते हैं, जिसके आधार पर विशेषज्ञ डॉक्टर इलाज और दवाओं का चयन करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मॉलिक्यूलर लैब शुरू हो जाएं तो हजारों मरीजों को सस्ता और समय पर इलाज उपलब्ध कराया जा सकेगा।
कैंसर विशेषज्ञों के अनुसार लंग्स कैंसर में ईजीएफआर (EGFR), एएलके (ALK) और अन्य जीन म्यूटेशन, ब्रेस्ट कैंसर में एचईआर2 (HER2) और बीआरसीए (BRCA) तथा प्रोस्टेट कैंसर में मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग उपचार तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी कारण अब कैंसर की पहचान केवल लक्षणों तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि जीन और गुणसूत्रों की जांच भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
राज्य सरकार की आरजीएचएस और चिरंजीवी जैसी योजनाओं के तहत कई मरीजों को महंगी दवाएं भी उपलब्ध करवाई जा रही हैं। जिन दवाओं की कीमत निजी बाजार में 2 से 4 लाख रुपए या उससे अधिक हो सकती है, वे सरकारी योजनाओं के तहत कई मरीजों को मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही हैं।
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